फैटी लिवर का आयुर्वेद से बचाव और इलाज

भाग दौड़ वाली दिनचर्या और बदलते खान-पान के स्टाइल ने फैटी लीवर रोग के मरीज़ों में वृद्धि कर दी है। लिवर यानी यकृत शरीर का बेहद ज़रूरी अंग है जिसका काम हर एक खाई गयी चीज को प्रोसेस करने का होता है, साथ ही ये कई तरह के हानिकारक पदार्थों को हमारे खून से फ़िल्टर करता है। हम जो भी भोजन करते हैं उससे कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, फैट, विटामिन और मिनरल्स जैसे पोषक तत्वों को प्रोसेस करने का काम लिवर ही करता है। फास्ट-फूड, तला हुआ खाना लीवर पर अटैक करता है और उसे सही से काम करने से रोकने लगता है। जो आगे चलकर फैटी लीवर रोग में बदल जाता है। फैटी लिवर वह स्थिति होती है, जब लिवर की कोशिकाओं में गैरजरूरी फैट की मात्रा बढ़ जाती है और इससे लिवर को स्थायी नुकसान का खतरा रहता है।इस स्थिति के होने पर यदि समय से इलाज़ नही लिया जाए तो यह अल्कोहल हेपेटाइटिस, लिवर फेल्योर, सिरोसिस और यहां तक ​​कि लिवर कैंसर का कारण बन सकता है।
इस रोग से बचाव के उपाय और इलाज़ के बारे में बता रहे है चौकाघाट स्थित राजकीय स्नातकोत्तर आयुर्वेद महाविद्यालय एवं चिकित्सालय , वाराणसी के कायचिकित्सा एवं पंचकर्म विभाग के वैद्य डॉ अजय कुमार

फैटी लिवर के क्या लक्षण होते है–
इस बीमारी का आमतौर पर कोई संकेत या लक्षण नहीं पता चलता है। इसलिए इस रोग का पता काफी देर से चलता है। यह मुख्य रूप से 2 प्रकार का होता है। पहला नॉन अल्कोहलिक फैटी लिवर और दूसरा अल्कोहलिक फैटी लिवर। जो लोग शराब का सेवन नहीं करते हैं या कम मात्रा में करते हैं, उन्हें नॉन अल्कोहलिक फैटी लिवर की समस्या हो सकती है। निम्न लक्षणों से इसका अनुमान लगाया जा सकता है-
1. थकान लगना  
2. वजन घटना
3. भूख ना लगना
4. कमजोरी
5. लिवर का साइज़ में बढ़ जाना
6. पेट के उपरी हिस्से या बीच में दर्द होना
7. नॉन अल्कोहलिक स्टीटोहेपेटाइटिस यानी नैश और सिरोसिस होने पर हथेलियों का लाल होना, पेट में सूजन, त्वचा की सतह के नीचे बढ़ी हुए रक्त वाहिकाएं और त्वचा व आंखों का पीला होना आदि लक्षण दिख सकता है।

फैटी लिवर से बचने के क्या उपाय है–
1. अल्कोहल का सेवन कम या बंद करना चाहिए
2. अपने कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल में रखना चाहिए
3. चीनी और सैचुरेटेड फैटी एसिड का सेवन कम करे
4. वजन और BMI को नियंत्रित रखे
5. ब्लड सुगर को नियंत्रित करे
6. शारीरिक श्रम करे
7. ज्यादा तलीभुनी , वसायुक्त भोजन से परहेज करे
8. ताजे फल व सब्जियां खाना
9. रेड मीट की जगह चिकन या फिश खाना
10. रोज कम से कम 30 मिनट तक व्यायाम करें
11. खाने में ज्यादातर ताजा फल, सब्जियां लेनी चाहिए

फैटी लिवर के आयुर्वेदिक इलाज क्या है —
फैटी लिवर होने पर इलाज़ लेने में विलम्ब नही करना चाहिए। शीघ्र ही किसी योग्य वैद्य की सलाह से चिकित्सा प्रारंभ कर देनी चाहिए।
आयुर्वेद में लिवर के रोगों के लिए औषधियां भरपूर मात्रा में उपलब्ध है। कालमेघ, कुटकी, भूमिआवला, गुडुची, पुनर्नवा, रोहितक आदि औषधियां इसमे बहुत लाभदायक है। इसके अलावा रोहितकरिष्ट , आरोग्यवर्धिनी, कालमेघासव, फलत्रिकादी क्वाथ से इसका इलाज़ किया जाता है।

आज हेपेटाइटिस का रोग महामारी जैसा ख़तरा बन कर सामने खड़ा है। हेपेटाइटिस से बचाव और इसका इलाज संभव है, बशर्ते कि लोग जागरुक रहें। हेपेटाइटिस के आयुर्वेद में उपचार के साथ साथ विभिन्न पहलुओ के बारे में बता रहे है राजकीय स्नातकोत्तर आयुर्वेद महाविद्यालय एवं चिकित्सालय , वाराणसी के कायचिकित्सा एवं पंचकर्म विभाग के प्रवक्ता डॉ अजय कुमार –
हेपेटाइटिस यानि यकृत शोथ मूल रूप से लीवर की बीमारी होती है जिसमे लीवर में सूजन आ जाती है। हेपेटाइटिस होने के बहुत से कारण जैसे वायरल, बैक्टीरियल, अल्कोहलिक , सिर्र्होटिक आदि बहुत से कारण होते है| इनमे से सबसे घातक वायरल हेपेटाइटिस पाँच प्रकार के वायरस से होता हैं,
• हेपेटाइटिस-ए,
• हेपेटाइटिस-बी,
• हेपेटाइटिस-सी,
• हेपेटाइटिस-डी और
• हेपेटाइटिस-ई
इन पांचो में से भी टाइप-बी और टाइप-सी लाखों लोगों में क्रॉनिक बीमारी का कारण बन रहे हैं क्योंकि इनके कारण लीवर सिरोसिस और कैंसर का खतरा अधिक होता है। हेपेटाइटिस-बी, इन्फेक्टेड ब्लड के ट्रांसफ्यूशन और सिमेंन और दूसरे बॉडी फ्लूइड के संसर्ग के कारण होता है तथा, हेपेटाइटिस-सी,  ब्लड और इन्फेक्टेड इन्जेक्शन के इस्तेमाल से होता है। अल्कोहलिक हेपेटाइटिस, अत्यधिक शराब के सेवन से होता है | कुछ दवाईयाँ जैसे एसिटामिनोफेन के अधिक सेवन से भी  हेपेटाइटिस  हो जाता है।

क्या है हेपेटाइटिस होने के कारण:-
• वायरल संक्रमण के कारण |
• एल्कोहल यानि शराब का अधिक सेवन 
• ज्यादा मात्रा में कुछ विशेष दवाई लेने से
• दूषित भोजन व दूषित जल पीने से
• गंदे होटल व रेस्तरां में अधिक समय तक खाने-पीने से पाचन क्रिया विकृत होने पर
• शरीर में अम्लता की अत्यधिक वृद्धि  |
• अधिक तीखे एवं मिर्च – मसाले वाले खाद्य पदार्थों का लम्बे समय तक सेवन करना |
• पित्त नलिका में पत्थरी के कारण |
• अधिक अम्लीय, क्षारीय, अति उष्ण, विरुद्ध एवं असात्मय भोजन के सेवन से भी पीलिया होने का खतरा रहता है |
क्या है हेपेटाइटिस  के लक्षण:-
• पीलिया तथा त्वचा और आंखों का पीला पड़ जाना
• मूत्र का रंग गहरा पीला या हरा हो जाना
• अत्यधिक थकान
• उल्टी
• पेट के उपरी हिस्से में दर्द और सूजन
• अत्यधिक खुजली
• भूख कम लगना
• वज़न का घटना
हेपेटाइटिस का पता किस जाँच से चलता है :-
इसके लिए इन टेस्ट को करने की सलाह दी जाती है-
• लीवर फंक्शन टेस्ट
• पेट का अल्ट्रासाउन्ड
• हेपैटाइटिस ए, बी और सी का टेस्ट (hepatitis A,B, or C)
• लीवर बायोपसी

कैसे करे हेपैटाइटिस से बचाव :-
• अपना रेजर, टूथब्रश और सूई को किसी से शेयर न करें,
• टैटू करने के वक्त उपकरणों को हमेशा स्टेरीलाइज कराये ।
• कान को छेद करते वक्त इस बात का ध्यान रखें कि मशीन  साफ और स्टेरीलाइज हो।
• सेक्स करते वक्त सावधानी बरतें।
• बच्चों को हेपेटाइटिस से बचाव के लिए समय पर टिका लगवाए ।
• हॉट, स्पाइसी, और ऑयली खाने से परहेज करें |
• प्रिजर्व्ड़ फूड, केक, पेस्ट्री, चॉकलेट, एल्कोहल और सोडा वाले ड्रिंक से परहेज करें।
• खाने मे केला, आम, टमाटर, पालक, आलू, आंवला, अंगूर, मूली, नींबू, सूखे खजूर, किशमिश, बादाम और इलायची ज्यादा शामिल करें।
• इस स्थिति मे ज्यादा फिजिकल वर्क न करें और  पूरा आराम करें।

आयुर्वेद में हेपेटाइटिस
आयुर्वेद में हेपेटाइटिस को कामला रोग  या पीलिया के नाम से जाना जाता है | कामला रोग की उत्पत्ति पित्त के रक्त में मिलने से होती है। यकृत में पित्त का निर्माण होता है। यही पित्त जब यकृत विकृति से या अन्य किसी कारण से रक्त में मिलने लगता है तो कामला रोग की उत्पत्ति होती है। चिकित्सा में विलम्ब करने और भोजन में लापरवाही बरतने से कामला रोग अधिक उग्र होता जाता है। रोगी के मल-मूत्र के साथ उसका पसीना भी पीला हो जाता है। रोगी के नेत्र भी पीले दिखाई देते हैं।  चिकित्सा में विलम्ब होने से कामला रोग उग्र रूप धारण कर लेता है। रोगी ज्वर से पीड़ित होता है। रोगी की भूख नष्ट हो जाती है। भोजन के प्रति अरुचि हो जाती है। रात को पर्याप्त नींद नहीं आने के कारण रोगी का स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है। उदर में शूल की विकृति भी होती है। रोगी बहुत अधिक निर्बलता और थकावट अनुभव करता है। इसके रोगी के उपचार के लिए औषधि के साथ – साथ उचित आहार व्यवस्था भी जरुरी होती है | पूर्ण विश्राम एवं संतुलित आहार से इस रोग को बढ़ने से रोका जा सकता है | अत: रोगी की आहार व्यवस्था पर ध्यान दिया जाना चाहिए जिससे धीरे – धीरे सुधार होता है |
आयुर्वेद में इसके लिए बहुत सी औषधिया बताई गयी है जिनमे से कुछ निम्न है जिसे वैद्य की सलाह से लेने पर बहुत फायदा मिलता है | इन औषधियों के साथ ही पंचकर्म विशेष रूप से विरेचन कर्म बहुत ही लाभदायक होता है |
• कुटकी
• भुमयामल्की
• काकमाची
• त्रिफला चूर्ण
• अविपत्तिकर चूर्ण
• अरोग्यवर्धिनि वॅटी
• पुनर्नावादी मंडूर 
• यक्रिदारी लौह
• रोहितकारिष्ट
• कालमेघासव
• कुमारियासाव

हेपेटाइटिस में क्या खाएं?
• करेले के पत्तों के रस को हरीतकी के साथ सेवन करने पर पीलिया रोग नष्ट होता है।
• मकोय का रस 5 ग्राम मात्रा में सुबह-शाम पीने से पीलिया रोग में बहुत लाभ होता है।
• गन्ने का रस दिन में दो बार अवश्य सेवन करें।
• तक्र (मट्ठे) में चार-पांच काली मिर्च का चूर्ण मिलाकर सेवन करें।
• गिलोय का 5 ग्राम रस सुबह और 5 ग्राम रस शाम को पिएं।
• हल्के सुपाच्य खाद्य पदार्थों का ही सेवन करें।
• जल को उबालकर और छानकर पिएं।
• इस रोग में साफ़ एवं स्वच्छ गन्ने का रस लेना सर्वोतम सिद्ध होता है |
• इस रोग में कच्चे नारियल का पानी पीना बहुत लाभकारी होता है |
• दही में पानी मिलाकर इसकी छाछ बना ले एवं सेवन करे |
• रात के समय एक गिलास पानी में मुन्नका को भिगों दे | सुबह मुन्नका के बीज निकाल कर इन्हें खालें और ऊपर से बच्चा हुआ पानी पीलें |
• पपीता का सेवन करें |
• हमेशां पौष्टिक एवं सुपाच्य भोजन लें |
• उष्ण, तीक्षण और अम्लीय पदार्थों का त्याग कर दें |
• शराब एवं अन्य प्रकार के नशे से दूर रहना ही अच्छा रहता है |

हेपेटाइटिस में क्या नहीं खाएं?
• घी, तेल, मक्खन, अंडे, मांस-मछली का सेवन न करें।
• उष्ण मिर्च-मसालों और अम्ल रस से बने खाद्य पदार्थों का सेवन न करें।
• चाय, कॉफी, शराब का सेवन न करें।
• छोले-भटूरे, गोल-गप्पें, टिकिया, समोसे आदि चटपटे खाद्य पदार्थ नहीं खाने चाहिए।
• फॉस्ट फूड, चाइनीज व्यंजन का बिल्कुल सेवन न करें।
• दूषित जल, कोल्ड ड्रिंक का सेवन न करें।
-=-=-=-

Similar Posts